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मेघ आए

ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Poems) • Chapter 5

megh aaye monsoon

पाठ का परिचय (Introduction):

'मेघ आए' सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी द्वारा रचित एक अत्यंत सुंदर और मनोरम कविता है। यह पूरी कविता मानवीकरण अलंकार (Personification) पर आधारित है। कवि ने आकाश में घिरकर आने वाले काले बादलों (मेघों) की तुलना एक शहर से गाँव में आने वाले सज-धज कर दामाद (पाहुन/अतिथि) से की है। जैसे दामाद के गाँव आने पर पूरे गाँव और ससुराल में ख़ुशी, हलचल और उल्लास छा जाता है, वैसे ही बादलों के आने पर प्रकृति के विविध उपादान (पेड़, हवा, नदी, लता) खुशी से झूम उठते हैं।

1. कवि परिचय (Poet Introduction)

रचनाकार: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (Sarveshwar Dayal Saxena)

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी आधुनिक हिंदी कविता (नई कविता) के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उनका जन्म 15 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले में हुआ था। वे अपनी कविताओं में ग्रामीण जीवन, प्रकृति के प्रति गहरा लगाव, और समाज के यथार्थ को अत्यंत सरल और बिंबात्मक (Visual) भाषा में प्रस्तुत करते हैं। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।
प्रमुख रचनाएँ: काठ की घंटियाँ, कुआनो नदी, जंगल का दर्द, खूँटियों पर टँगे लोग (कविता संग्रह)।

2. कविता की सप्रसंग व्याख्या (Explanation)

पद्यांश 1: मेघ रूपी मेहमान का आगमन

मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के। आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली, दरवाजे-खिड़कियाँ खुलने लगीं गली-गली, पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के। मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।

शब्दार्थ: बन-ठन के सँवर के = सज-धज कर (Dressed up nicely); बयार = हवा (Breeze); पाहुन (Pahun) = दामाद/मेहमान (Guest/Son-in-law); ज्यों = जैसे।

प्रसंग: इस पद्यांश में कवि ने वर्षा ऋतु में छाए बादलों को शहर से आए एक सजे-धजे दामाद के रूप में प्रस्तुत किया है।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि आकाश में काले-काले सुंदर बादल (मेघ) सज-धज कर इस प्रकार घिर आए हैं, मानो कोई दामाद बहुत दिनों बाद शहर से सज-धज कर (बन-ठन के) अपनी ससुराल (गाँव) आया हो। जिस प्रकार मेहमान के आने की ख़बर देने के लिए गाँव की लड़कियाँ नाचती-गाती हुई आगे-आगे चलती हैं, उसी प्रकार बादलों के आने से पहले शीतल हवा (बयार) नाचती-गाती हुई (तेज़ गति से) आगे-आगे चलने लगी है। मेहमान (दामाद) को देखने के लिए गाँव के लोग गली-गली में अपने घरों के दरवाज़े और खिड़कियाँ खोलने लगे हैं। (अर्थात् हवा के तेज़ झोंकों से बंद घरों के दरवाज़े-खिड़कियाँ तेज़ आवाज़ के साथ अपने आप खुलने लगे हैं)।

पद्यांश 2: प्रकृति का उल्लास (पेड़, धूल और नदी)

पेड़ झुक झाँकने लगे गरदन उचकाए, आँधी चली, धूल भागी घाघरा उठाए, बाँकी चितवन उठा, नदी ठिठकी, घूँघट सरके। मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।

शब्दार्थ: उचकाए = उठाकर/बढ़ाकर (Raising neck); धूल (Dhool) = गर्द/मिट्टी; घाघरा (Ghaghra) = गाँव की औरतों का एक वस्त्र (Skirt); बाँकी चितवन = तिरछी नज़र (Sidelong glance); ठिठकी = रुककर देखना (Stopped to glance); घूँघट सरके = घूँघट खिसकना।

प्रसंग: यहाँ बादलों के आने का पेड़ों, धूल और नदी पर पड़ने वाले प्रभाव का मानवीकरण किया गया है।

व्याख्या: बादलों के आने पर तेज़ हवा चलने के कारण पेड़ कभी झुक जाते हैं, तो कभी तेज़ हवा में ऊपर उठ जाते हैं। ऐसा लगता है मानो गाँव के लोग अपनी गरदन उचकाकर (उठाकर) उत्सुकता से आए हुए दामाद (पाहुन) को देखने की कोशिश कर रहे हों।
अचानक तेज़ आँधी चलने लगती है जिससे धूल उड़ने लगती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई गाँव की लड़की (ग्रामीण स्त्री) मेहमान को देखकर शर्म के मारे अपना घाघरा उठाकर तेज़ी से घर की ओर भाग रही हो।
नदी रूपी गाँव की बहू भी मेहमान (बादलों) को देखकर ठिठक (रुक) गई है और उसका घूँघट थोड़ा खिसक गया है। वह घूँघट की ओट से अपनी तिरछी नज़रों (बाँकी चितवन) से दामाद (मेघ) को निहार रही है।

पद्यांश 3: पीपल (बुज़ुर्ग) का स्वागत और पत्नी का मान-मनौव्वल

बूढ़े पीपल ने आगे बढ़कर जुहार की, 'बरस बाद सुधि लीन्ही'- बोली अकुलाई लता ओट हो किवार की, हरसाया ताल लाया पानी परात भर के। मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।

शब्दार्थ: जुहार की (Juhar ki) = झुककर नमस्कार/स्वागत करना; बरष = वर्ष (Year); सुधि लीन्ही = याद की (Remembered); अकुलाई (Akulai) = व्याकुल/परेशान (Restless); लता = बेल (Creeper); ओट (Oat) = आड़/पीछे; किवार (Kiwar) = दरवाज़ा; हरसाया (Harsaya) = प्रसन्न होकर; ताल = तालाब (Pond); परात (Parat) = बड़ी थाली।

प्रसंग: इसमें गाँव के बुज़ुर्ग (पीपल) द्वारा दामाद का स्वागत, विरह में व्याकुल पत्नी (लता) की शिकायत और साले (तालाब) द्वारा पैर धोने का बड़ा मार्मिक दृश्य है।

व्याख्या: गाँव के सबसे बुज़ुर्ग सदस्य (बूढ़े पीपल के पेड़) ने हवा के झोंके से झुककर मेघ रूपी दामाद का अभिवादन (जुहार/स्वागत) किया।
पूरे साल गर्मी और धूप की तपन सहने के कारण व्याकुल हो चुकी लता (कवि ने लता को मेघ की पत्नी/प्रेयसी माना है) सीधे सामने न आकर, दरवाजे (किवार) की ओट (पीछे) में छिपकर उलाहना (शिकायत) देते हुए बोली, "आपने तो पूरे एक साल बाद मेरी सुध (याद) ली है।"
मेहमान (जीजा) के आने से घर का कोई सदस्य (जैसे साला) ख़ुशी के मारे तालाब रूपी अपनी बड़ी परात में पानी भरकर ले आया है, ताकि वह आदर के साथ दामाद (मेघ) के पैर धो सके।

पद्यांश 4: मेघ बरसने का अंतिम दृश्य (क्षमा और मिलन)

छितिज अटारी गहराई दामिनि दमकी, 'छमा करो गाँठ खुल गई अब भरम की', बाँध टूटा झर-झर मिलन के अश्रु ढरके। मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।

शब्दार्थ: छितिज (Kshitij/Horizon) = वह स्थान जहाँ धरती और आकाश मिलते हुए दिखाई देते हैं; अटारी (Atari) = छत/अट्टालिका (Roof/Terrace); दामिनि दमकी = बिजली चमकी (Lightning struck); छमा (Kshama) = क्षमा/माफ़ी; भरम (Bharam) = भ्रम/शंका (Doubt); अश्रु ढरके = आँसू छलकने लगे या बहने लगे।

प्रसंग: अंत में मिलन के आँसुओं (वर्षा) के रूप में मेघ बरस पड़ते हैं और धरती की प्यास बुझ जाती है।

व्याख्या: अंततः मेघ (दामाद) गाँव के उस क्षितिज (Kshitij) रूपी घर की अटारी (छत) पर पहुँच जाते हैं जहाँ काले बादल और गहरे हो जाते हैं और अचानक ज़ोर से बिजली चमकने लगती है (दामिनि दमकी)। यह बिजली का चमकना ऐसा लगता है मानो दामाद को देखकर पत्नी (धरती/लता) के चेहरे पर चमक आ गई हो।
अब पत्नी कहती है कि "मुझे क्षमा करो, मेरे मन में जो यह भ्रम (शंका) था कि तुम नहीं आओगे, अब वह भ्रम टूट गया है (गाँठ खुल गई)।" अंततः दोनों के बीच का बाँध (विछोह) टूट जाता है और पति-पत्नी (मेघ और धरती/लता) के शुभ मिलन के कारण उनकी आँखों से झर-झर करके प्रेम के आँसू बहने लगते हैं। अर्थात् ज़ोरदार बारिश होने लगती है। इस प्रकार बादलों को सज-धज कर आते हुए दिखाया गया है।

3. पाठ के मुख्य उद्देश्य (Themes & Personification)

4. परीक्षा उपयोगी प्रश्न-उत्तर (Practice Zone)

BOARD EXAM QUESTIONS

प्रश्न 1: 'मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के' - पंक्ति में किस अलंकार का प्रयोग हुआ है और दामाद (पाहुन) की उपमा मेघों के लिए क्यों सटीक है?

उत्तर: इस पंक्ति में मानवीकरण अलंकार (Personification) का प्रयोग हुआ है क्योंकि प्राकृतिक मेघ में मानवीय क्रियाओं (सजना-सँवरना) का आरोप किया गया है। 'पाहुन' (दामाद) की उपमा मेघों के लिए इसलिए सटीक है क्योंकि जिस प्रकार पूरे साल में कभी-कभार दामाद सज-धज कर अपनी ससुराल आता है, तो पूरे गाँव में विशेष हलचल और उल्लास छा जाता है (लोग खिड़की-दरवाज़ों से उसे देखते हैं)। ठीक वैसे ही भारत में साल भर के इंतज़ार के बाद जब वर्षा ऋतु के मेघ काले और घने रूप में सजकर आते हैं, तो गर्मी से परेशान पूरी प्रकृति (हवा, पेड़, लताएँ, ताल) खुशी से झूमने लगती है।


प्रश्न 2: "बूढ़े पीपल ने आगे बढ़कर जुहार की" – इस पंक्ति का क्या आशय है?

उत्तर: भारतीय ग्रामीण संस्कृति में जब भी कोई मेहमान घर आता है, तो घर का सबसे बड़ा या बुज़ुर्ग सदस्य आगे बढ़कर उसका अभिवादन (Приветствие/Greeting) करता है। गाँव में पीपल का पेड़ सबसे पुराना और आयु में सबसे बड़ा (दीर्घायु) माना जाता है। इसलिए कवि ने पीपल को 'बूढ़ा' (बुज़ुर्ग) कहा है। जब बादलों (दामाद) के आने पर तेज़ हवा चलती है, तो पीपल का बड़ा पेड़ हवा के कारण नीचे झुकता है। इसी झुकने को कवि ने पीपल द्वारा मेघ रूपी दामाद का आगे बढ़कर अभिवादन या 'जुहार' (नमस्कार) करना कहा है।


प्रश्न 3: लता ने बादल से क्या उलाहना (शिकायत) दिया और फिर क्षमा क्यों माँगी?

उत्तर: लता को कवि ने मेघ रूपी दामाद की व्याकुल पत्नी माना है। लता ने किवाड़ की ओट (दरवाज़े के पीछे) में छिपकर मेघ से शिकायत (उलाहना) की कि उसने पूरे एक साल तक उसकी कोई याद (सुधि) नहीं ली। वह गर्मी में तड़पती रही। इसके बाद जब मेघ क्षितिज (अटारी) पर घिर आए और बिजली चमकी, तो अंत में घनघोर बारिश होने लगी। तब लता ने मेघ से क्षमा माँगी और कहा, "मुझे माफ़ कर दो, मेरे मन का यह भरम (भ्रम/शंका) दूर हो गया है कि तुम इस साल मुझे मिलने (बरसने) नहीं आओगे।" मिलन की ख़ुशी में बारिश के रूप में झर-झर आँसू बहने लगे।

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